Cheque Bounce Law – भारतीय रिज़र्व बैंक ने देश की बैंकिंग प्रणाली में एक महत्वपूर्ण सुधार की घोषणा की है। चेक के माध्यम से किए जाने वाले भुगतानों में होने वाली अनियमितताओं पर अब कड़ी निगरानी रखी जाएगी। जो लोग बार-बार अपर्याप्त राशि के कारण चेक वापस करवाते हैं, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह निर्णय वित्तीय लेन-देन में जवाबदेही सुनिश्चित करने और धोखाधड़ी रोकने के उद्देश्य से लिया गया है।
परंपरागत रूप से चेक एक विश्वसनीय भुगतान माध्यम रहा है। लोग और व्यवसाय इस पर भरोसा करके लेन-देन करते हैं। लेकिन जब कोई चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण अस्वीकृत हो जाता है, तो लेनदार को न केवल आर्थिक हानि होती है बल्कि उसका समय भी बर्बाद होता है। ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए आरबीआई ने बैंकों को व्यापक अधिकार दिए हैं।
नए दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि किसी खाताधारक द्वारा जारी चेक तीन बार लगातार अस्वीकृत होते हैं, तो उस व्यक्ति को संदिग्ध ग्राहक माना जाएगा। बैंक उसके खाते को विशेष निगरानी के दायरे में ला देगा। इसके बाद भी यदि वह सावधानी नहीं बरतता, तो उसके खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे।
निगरानी सूची में नाम आने के गंभीर परिणाम
एक बार जब किसी ग्राहक का नाम बैंक की निगरानी सूची में आ जाता है, तो उसकी बैंकिंग गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखी जाती है। प्रत्येक लेन-देन की समीक्षा की जाती है। बैंक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वह व्यक्ति फिर से वित्तीय अनियमितता न करे। यह प्रक्रिया उस व्यक्ति के लिए असुविधाजनक हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक है।
यदि निगरानी के बावजूद चेक अस्वीकृति की घटनाएं दोहराई जाती हैं, तो बैंक कई गंभीर कार्रवाई कर सकता है। सबसे पहले, खाते को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि आप अपने ही खाते से धन निकासी नहीं कर पाएंगे। यह स्थिति किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद शर्मनाक और कठिन हो सकती है।
इसके अलावा, उस खाताधारक को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा जाता है। इस श्रेणी में आने का मतलब है कि बैंक आपको अविश्वसनीय ग्राहक मानता है। ऐसे ग्राहकों को भविष्य में किसी भी प्रकार की वित्तीय सेवा मिलना मुश्किल हो जाता है। नई चेक बुक जारी करने से इनकार किया जा सकता है। ऋण आवेदन तुरंत खारिज हो सकते हैं। क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी बंद की जा सकती है।
कानूनी पहलू और दंड का प्रावधान
भारत में चेक अनादर को हल्के में नहीं लिया जाता। यह केवल बैंकिंग समस्या नहीं, बल्कि एक आपराधिक कृत्य है। परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 इसे स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध घोषित करती है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से ऐसा करता है, तो उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है।
कानून के अनुसार, दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को चेक की मूल राशि के दोगुने तक का आर्थिक दंड देना पड़ सकता है। यह राशि काफी बड़ी हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि एक लाख रुपये का चेक अस्वीकृत हुआ, तो जुर्माना दो लाख रुपये तक हो सकता है। इसके साथ ही दो वर्ष तक की कारावास की सजा भी संभव है।
पहले इस कानून को लागू करने में समय लगता था। न्यायालयी प्रक्रिया लंबी होती थी और कई मामलों में दोषी बच निकलते थे। लेकिन अब आरबीआई के नए नियमों से बैंक स्वयं तत्काल कार्रवाई कर सकते हैं। यह एक दोहरी सुरक्षा प्रणाली है – बैंकिंग स्तर पर त्वरित कार्रवाई और कानूनी स्तर पर दंड।
क्रेडिट स्कोर पर दीर्घकालिक प्रभाव
चेक बाउंस का सबसे गंभीर दीर्घकालिक प्रभाव आपके क्रेडिट स्कोर पर पड़ता है। CIBIL और अन्य क्रेडिट ब्यूरो इस जानकारी को रिकॉर्ड करते हैं। आपका स्कोर नीचे गिर जाता है, जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार का ऋण लेना लगभग असंभव हो जाता है। चाहे आप गृह ऋण लेना चाहें, वाहन ऋण लेना चाहें या व्यवसाय के लिए धन चाहें – सभी जगह आपको अस्वीकृति मिलेगी।
खराब क्रेडिट स्कोर कई वर्षों तक आपके रिकॉर्ड में रहता है। इसे सुधारने में बहुत समय और प्रयास लगता है। आपको लगातार अनुशासित वित्तीय व्यवहार दिखाना होता है। सभी बिलों का समय पर भुगतान, कोई बकाया न रखना, और जिम्मेदार खर्च की आदतें – ये सब करने के बावजूद स्कोर धीरे-धीरे ही सुधरता है। इसलिए शुरू से ही सावधानी बरतना बेहतर है।
किन लोगों को होगी सबसे अधिक परेशानी
ये नए नियम उन सभी को प्रभावित करेंगे जो नियमित रूप से चेक का उपयोग करते हैं। व्यापारी वर्ग विशेष रूप से प्रभावित होगा। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े थोक व्यवसायी तक – सभी को अब अधिक सतर्क रहना होगा। व्यापार में चेक एक सामान्य भुगतान विधि है, लेकिन अब इसका उपयोग केवल तभी करना चाहिए जब आप सुनिश्चित हों कि खाते में पर्याप्त शेष राशि है।
कंपनियां और फर्म भी इस श्रेणी में आती हैं। कई बार कंपनियों के वित्तीय प्रबंधन में कमी के कारण चेक अस्वीकृत हो जाते हैं। अब ऐसी लापरवाही महंगी पड़ेगी। कंपनी का बैंकिंग रिकॉर्ड खराब होने से व्यवसाय विस्तार में बाधा आएगी। नए निवेशक या भागीदार भी खराब वित्तीय प्रतिष्ठा वाली कंपनियों से दूर रहते हैं।
आम नागरिक भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। कई लोग व्यक्तिगत लेन-देन में चेक का उपयोग करते हैं – किराया देने में, दोस्तों-रिश्तेदारों को भुगतान में, या छोटी-मोटी खरीदारी में। यदि किसी कारणवश आपका चेक वापस हो जाता है, तो इसका रिकॉर्ड बना रहता है। बार-बार ऐसा होने से आप भी गंभीर परेशानी में पड़ सकते हैं।
आरबीआई ने यह कदम क्यों उठाया
पिछले कुछ वर्षों में पूरे देश में चेक धोखाधड़ी के मामले बढ़े हैं। कुछ लोगों ने इसे जानबूझकर एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। वे चेक जारी करते हैं लेकिन खाते में धन नहीं रखते। इससे दूसरे पक्ष को धोखा होता है और उसका समय बर्बाद होता है। कई मामलों में तो लोग कर्ज लेकर चेक दे देते हैं और फिर जानबूझकर खाता खाली रखते हैं।
ऐसी प्रथाओं ने बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। लोगों का चेक पर से भरोसा उठने लगा था। व्यापारी चेक स्वीकार करने से हिचकिचाने लगे थे। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक थी। इसलिए आरबीआई ने हस्तक्षेप करना आवश्यक समझा।
केंद्रीय बैंक का मानना है कि वित्तीय अनुशासन किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। यदि लोग लेन-देन में ईमानदारी नहीं बरतेंगे, तो पूरी प्रणाली डगमगा सकती है। इसलिए सख्त नियम बनाना और उन्हें लागू करना जरूरी था। यह कदम अल्पकालिक दर्द दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक में यह सभी के लिए फायदेमंद होगा।
बैंकिंग प्रणाली में आने वाले सकारात्मक बदलाव
इस नए नियम से बैंकिंग व्यवस्था में कई सकारात्मक परिवर्तन आने की उम्मीद है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण बदलाव यह होगा कि लोग अधिक जिम्मेदार बनेंगे। हर कोई चेक जारी करने से पहले दो बार सोचेगा। वे सुनिश्चित करेंगे कि उनके खाते में पर्याप्त राशि है। यह अनुशासन वित्तीय स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
दूसरा बदलाव यह होगा कि लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ेगी। जब लोग जानेंगे कि गलती की कीमत चुकानी पड़ेगी, तो वे ईमानदारी से काम करेंगे। धोखाधड़ी के मामले घटेंगे। व्यापारिक लेन-देन अधिक विश्वसनीय होंगे। लोगों को एक-दूसरे पर भरोसा करना आसान होगा।
तीसरा, बैंकों का काम भी सरल होगा। उन्हें अब डिफॉल्टरों से निपटने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश मिल गए हैं। वे त्वरित निर्णय ले सकते हैं। इससे बैंकिंग संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। समय और धन की बचत होगी। अंततः यह सब ग्राहकों को बेहतर सेवाओं के रूप में लौटेगा।
ग्राहकों के लिए व्यावहारिक सलाह
यदि आप नियमित रूप से चेक का उपयोग करते हैं, तो कुछ सावधानियां बरतना अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात – कभी भी ऐसा चेक जारी न करें जिसका भुगतान आप नहीं कर सकते। चेक देने से पहले अपने खाते की शेष राशि जरूर देख लें। यदि संदेह हो, तो मोबाइल बैंकिंग या एटीएम से तुरंत जांच कर लें।
अपने बैंक खाते का नियमित रूप से विवरण देखें। महीने में कम से कम दो बार स्टेटमेंट की जांच करें। इससे आपको पता रहेगा कि कौन से चेक क्लियर हो गए हैं और कितनी राशि बची है। कई बार लोग भूल जाते हैं कि उन्होंने कितने चेक जारी किए हैं। यह भूल महंगी पड़ सकती है।
एक चेक रजिस्टर बनाए रखें। हर चेक की विस्तृत जानकारी नोट करें – नंबर, तारीख, प्राप्तकर्ता का नाम, राशि। यह आदत आपको व्यवस्थित रखेगी। आप जान पाएंगे कि किस-किस को चेक दिए हैं और कब तक वे प्रस्तुत हो सकते हैं। यदि आवश्यक हो, तो समय पर खाते में धन जमा कर सकते हैं।
यदि चेक अस्वीकृत हो जाए तो क्या करें
कभी-कभी ईमानदार गलतियां हो सकती हैं। हो सकता है आप किसी चेक को भूल गए हों या खाते में धन जमा करने में देरी हो गई हो। यदि आपका चेक अस्वीकृत हो जाता है, तो घबराएं नहीं बल्कि तुरंत कार्रवाई करें। सबसे पहले उस व्यक्ति या संस्था से संपर्क करें जिसे आपने चेक दिया था। उनसे माफी मांगें और स्थिति स्पष्ट करें।
तत्काल वैकल्पिक भुगतान विधि की पेशकश करें। NEFT, RTGS, UPI या नकद – जो भी सुविधाजनक हो, उससे भुगतान करें। जितनी जल्दी आप भुगतान करेंगे, उतना ही बेहतर होगा। इससे दूसरे पक्ष को भी विश्वास होगा कि यह जानबूझकर नहीं था।









